श्रीमती माई खरे इन्होने राजेंद्र नगर इन्दौर में रहकर ही भजन मंडल की स्थापना की |

सन 1993 में इसकी शुरुआत उनकी बहु ने दस महिलाओं को साथ लेकर एक समूह बनाया इस समूह को गीतांजलि नाम दिया गया |

इन्होने इन्दौर के सभी मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में जाकर अपनी भजनों की प्रस्तुति दी| इसके साथ ही त्यौहार या ख़ुशी के अवसर पर अपने भजनों को तथा गीतों को प्रस्तुत किया |

जैसे जन्मदिवस, शादी, शादी की सालगिरह आदिकई बार एक दिन में 2 या 3 प्रस्तुतियां दी जाती इनके भजनों पर श्रोता मंत्र मुग्धहोकर सुनते क्योकि भजन के शब्द इतने मधुरता से भावपूर्ण होकर गाए जाते और ये कला सभी में विधमान थी |

इस समूह की प्रथम प्रस्तुति राजेंद्र नगर स्थित राम मंदिर में गणेश उत्सव के दोरान हुई | इसके बाद यह दौर चल पड़ा इन्दौर ही नहीं आसपास खरगोन, उज्जैन, देवास, महू, देपालपुर, भोपाल, नागदा, हातोद में भी जाकर अपनी प्रस्तुति दी|

अब भजनों की संख्या व् गुणवत्ता भी बढती गयी भजनों को शास्त्रीय संगीत के आधार से बनाया गया |

सन 2004 से एक नवीनतम कार्यक्रम की शुरुवात हुई जिसमे भजनों के साथ नृत्य किया जाने लगा अब सदस्यों की संख्या भी बढ़ी जो पारुल भजन के नाम से मशहूर हुआ जो जनसमुदाय द्वारा खूब सराहा गया | मंडल की सदस्यों द्वारा इन्दौर में निकलने वाली हिंदी जो आषाढी एकादशी को निकली जाती है उसमे भी उत्साह से भाग लिया गया| दत्त जन्म के अवसर पर पालकी यात्रा में शामिल होना भी अहोभाग्य है |

इन सब के फोटो यहाँ वेबसाइट पर देखे जा सकते है|

guru-mai

परिचय

हमारी गुरु श्रीमती माई खरे का संक्षिप्त परिचय

इनका जन्म सन 10 अक्टूबर 1924 को हुआ था | इनका विवाह 1949 में हुआ था | विवाह के पश्चात् ये अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गई लेकिन बचपन से ही इश्वर के प्रति आस्था होने से वो मन ही मन गुनगुनाती रहती थी | और मन में आने वाले शब्दों को तुरंत लिख लेटी थी |

उनके पतिदेव की नौकरी बरझई जेसी जगह जो की जंगली इलाका था | उन्हें उनके साथ रहना पड़ता था आसपास कोई पडोसी भी नहीं थे | एकबार रक्षाबंधन के अवसर पर वो अपने रिश्तेदार के यहाँ गई थी वहा उन्होंने अपनी लिखिहुई काव्य रचना को वास्तविक रूप दिया |

आगेबच्चो की पढाई के कारन इन्दौर में रहने लगी | यहाँ उनकी मुलाकात श्रीमती उषाबाईओक से हुई | उषाबाई के आग्रह पर माई ने अपनी ( स्वरचित ) रचना का भजन गाकर सुनाया |

माई ने अपना भजन संग्रह को प्रकाशित किया |

भजनसंग्रह की पुस्तक की जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध है |

ऐसी आदरणीय हमारी गुरु माई ( खरे) को कोटि कोटि प्रणाम उनका हमें अभिमान है | माई से हमें 400-500 भजनों का संग्रह विरासत के रूप में प्राप्त हुआ है |

हम गीतांजलि भजन मंडल की और से उन्हें आदरांजली देते है |